सोन पत्ती को सोने के समान शुभ माना जाता है, क्या आप जानते हैं? इस परंपरा का धार्मिक महत्व
बिलासपुर/यु मुरली राव
सोन पत्ती बांटने का महत्व और पौराणिक कथाएं
राजा रघु और ऋषि कौत्स की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि वरतंतु के शिष्य कौत्स ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद ऋषि गुरु ने गुरुदक्षिणा मांगी। गुरु के मांगने पर कौत्स ने राजा रघु से 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की मांग कीतब राजा रघु ने धन के देवता कुबेर से सहायता मांगी और कुबेर ने शमी और आपटा के वृक्षों पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। कौत्स ने जरूरत की मुद्राएं लेकर बाकी राजा को लौटा दीं, और राजा ने बची हुई स्वर्ण मुद्राएं प्रजा में बांट दीं। इसी घटना की याद में सोनपत्तियो को सोने का प्रतीक मानकर बांटा जाता है।

*महाभारत काल (पांडवों से जुड़ा संबंध)*
• महाभारत के अनुसार, पांडवों ने अपने 13वें वर्ष के अज्ञातवास के दौरान अपने सभी अस्त्र-शस्त्र एक शमी के पेड़ पर छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद विजयदशमी के दिन उन्होंने वहां से अस्त्र निकाले और शमी के पेड़ की पूजा की, जिसके बाद उन्हें कौरवों पर विजय प्राप्त हुई। तब से शमी को विजय और शक्ति का प्रतीक माना गया है।

*रामायण काल (भगवान श्रीराम से जुड़ा संबंध)*
भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले शमी के पौधे की पूजा की थी। रावण वध और अयोध्या लौटने की खुशी में भी इस दिन को उल्लास के साथ मनाया जाता है।
*सामाजिक सद्भाव और प्रेम*
सोन पत्ती बांटने की परंपरा आपसी मनमुटाव, द्वेष और कड़वाहट को भुलाकर, समाज में भाईचारा, प्रेम और एकता को बढ़ाने का संदेश देती
*विजयदशमी दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है* लेकिन इस त्योहार की कई ऐसी परंपराएं भी हैं, जो आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। इन्हीं में से एक है *सोनपत्ती* बांटने की परंपरा विजयादशमी के दिन लोग एक-दूसरे को सोनपत्ती देकर सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।
सोनपत्ती को सोने के समान शुभ मानने की परंपरा कई क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही है। दशहरे के दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से मुलाकात कर सोनपत्ती भेंट करते हैं। यह केवल पत्तियों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि सम्मान, स्नेह और रिश्तों को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।
महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों में आपटा वृक्ष की पत्तियों को सोनपत्ती के रूप में बांटने की परंपरा है। इसके पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। लोग इन पत्तियों को प्रतीकात्मक सोना मानकर एक-दूसरे को देते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आने की मंगलकामना करते हैं।
आधुनिक दौर में भी सोनपत्ती की यह परंपरा लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़े हुए है। दशहरे पर सोनपत्ती बांटने का संदेश साफ है—खुशियां बांटिए, रिश्तों में मिठास बढ़ाइए और समाज में प्रेम व सद्भाव बनाए रखिए। यही सोनपत्ती की परंपरा की असली खूबसूरती है।
